Wednesday, August 3, 2011

महामानव
हाँ यहीं
इस कस्बे की इन्ही गलियों में
मेरा भरा-भरा बचपन बीता है
किन्तु आज मेरा मन/महकती यादों के बीच भी
बिल्कुल रीता-रीता है!
कहां गया वो,
पूरा कस्बा घूम आया हूँ मैं जिसे ढूंढ़ता हुआ
मेरे बचपन का हमसाया, मेरे मन पर अंकित एक निरीह छाया
मैं फिर आया हूँ इस कस्बे में जिसके लिए
इतने सालों की छटपटाहट से जूझता हुआ

मुझे याद आता है-
रोज सुबह-शाम मोहल्लों के बच्चों का
पड़ जाना उसके पीछे
कोई ईंट-पत्थर के टुकड़े मारता था
उसके नंगे बदन पर
कोई धूल-कीचड़ उलीचता था
उसके घायल शरीर पर
और गालियों-सी भाषा में सब चिड़ाते थे उसे
कहकर- ताऊ! ताऊ!! ताऊ!!!
चिढ़कर प्रतिकार में/वह भी
उनको लक्ष्य करके/इधर-उधर
ईंट-पत्थर के टुकड़े फेंकता था/धुन्ध-कीचड़ उलीचता था/गालियां-सी बुदबुदाता था
और अन्ततः - ‘हू...ऊ...ऊ....हु...र्.....र्....र....’ की
डरावनी आवाज के साथ
उन्हे काफी दूर तक खदेड़ता था
इतने पर भी नहीं छोड़ते थे बच्चे उसका पीछा
तो बैठकर नाली के किनारे फुटपाथ पर
घुटनों में सिर छुपाकर
खूब रोया करता था वह /अपने भाग्य पर
इस खेल में कई बार/कुछ बड़े भी शामिल होते थे
लोग उसे पागल कहते थे

हाँ, वह एक पागल था
पागल ही नहीं, महापागल था
सिर में अढ़ाई सेर धूल का जमाव
शरीर पर मैल के मोटे-मोटे कतरे/ऊपर से सैकड़ों घाव
ओढ़ना और बिछौना थी/शरीर पर पड़ी
वर्षों पुरानी/मैली-कुचैली/फटी-नुची
मात्र आधा मर्दाना धोती
और हाथों में एक गन्दा सा कुल्हड़
बस यही थी- उसकी कुल सम्पत्ति

लोगों की दृष्टि में
हड्डियों के टूटने और सिर के फूटने से
उसे दर्द नहीं होता था शायद
मगर मैं देखा करता था- अपनी अधमुँदी आँखों से
आह! ईंट-पत्थरों की मार से
उसका वह निरीहतापूर्ण बिलबिलाना/दर्द से बुरी तरह छटपटाना
और/उन कथित सभ्य बच्चों, जवानों और बूढ़ों का
तालियाँ पीट-पीटकर आनन्दित होना
इतने पर भी/जब कभी मौका मिलता था
वह- हँसते-खेलते बच्चों को/टुकुर-टुकुर देखता था
उनकी स्वच्छन्द किलकारियों में डूबकर
कितने भोलेपन से मस्त होता था!
मैं उस निरीह बूढ़े को लेकर/जाने क्या-क्या सोचता था
उसके साथ/जैसे अपना
कोई सांस्कृतिक रिश्ता जोड़ता था!

एक लम्बे अर्से बाद/कस्बे में पुनः लौटा हूँ
मन की तहों में दबी बेचैनी से उद्वेलित होता हूँ
तो खुलकर/उस परम श्रद्धेय की तलाश करता हूँ
मेरी खुली तलाश पर/लोग हँसते हैं
खूब व्यंग्य कसते हैं-
‘वह कहीं नहीं गया/सीधा तेरे अन्दर समा गया है’
मुझे लगता है-
कस्बे का एक-एक बच्चा मेरे पीछे पड़ा है
हाथों में ईंट-पत्थर के टुकड़े लिए/धूल उलीचते हुए
और आनन्दित होकर/समवेत स्वर में चीखते हुए-
ताऊ! ताऊ!! ताऊ!!!
किन्तु मेरी तलाश रुकती नहीं है
मेरे अन्दर की सम्वेदना मरती नहीं है
मुझे बार-बार याद आता है-
‘हँसते-खेलते बच्चों को देखकर
उस कथित पागल का/वह भोलेपन से मस्त होना
बिना शिकवा-शिकायत के/ईंट-पत्थरों की मार सहना’

मैं ढूँढ़ता हूँ उसे
कस्बे की बस्तियों-बाजारों में
गाँवों की गलियो-हाटों में
पहाड़ों की गुफाओं-तलहटियों में
नालों/नदियों/नहरों/समुद्रों की गहराइयों में
जंगलों की झाड़ियों में/मैदानों की दूरियों में
हर कहीं खोजता हूँ
आदमी/पशु-पक्षी/पेड़-पोधों
गर्मी/वर्षा/सर्दी/धूप और हवा
सभी से पूछता हूँ उसके बारे में
कितनी अमानुषिकता फैली है/कि
कोई बात तक नहीं करता उसके बारे में

मैं जानता हूँ
हमारी संस्कृति बहुत बदल गई है
और इस बदली हुई संस्कृति में
उस पागल के लिए कोई स्थान नहीं है
पर/मैं यह भी जानता हूँ, कि-
उस कथित पागल की आँखों में/जो दिखता था
वह हमारी मूल संस्कृति की निशानी है
उसके बिना
हर मानवीय संस्कृति बेमानी है

मैं उसे खोजूँगा/जरूर खोजूँगा
खोजकर उसे
‘महामानव’ के रूप में प्रतिष्ठित करूँगा
मानवता के जिस स्तम्भ पर
खड़ी है संस्कृति हमारी!
मेरा वह ’महामानव’ है/उसका
सबसे बड़ा पुजारी!!

1 comment:

KAHI UNKAHI said...

सोचने को मजबूर करती एक भावपूर्ण रचना के लिए बधाई...।
प्रियंका