Monday, August 15, 2011

कुछ हाइकु

1.
हो न हो आज
कागज की नाव भी
होगी ही पार!

2.
कौन से दिन
रौशनी दिखायेगी
चाँदनी बन!


3.
आंगन मेरे
दाना-दाना ढूँढ़ती
गौरैया डोले

4.
माप ले सारे
श्याम को थे भेजे जो
तन्दुल न्यारे

5.
दाल गली ना
मल्टी के पाउच में
खारा पानी था!

Wednesday, August 3, 2011

महामानव
हाँ यहीं
इस कस्बे की इन्ही गलियों में
मेरा भरा-भरा बचपन बीता है
किन्तु आज मेरा मन/महकती यादों के बीच भी
बिल्कुल रीता-रीता है!
कहां गया वो,
पूरा कस्बा घूम आया हूँ मैं जिसे ढूंढ़ता हुआ
मेरे बचपन का हमसाया, मेरे मन पर अंकित एक निरीह छाया
मैं फिर आया हूँ इस कस्बे में जिसके लिए
इतने सालों की छटपटाहट से जूझता हुआ

मुझे याद आता है-
रोज सुबह-शाम मोहल्लों के बच्चों का
पड़ जाना उसके पीछे
कोई ईंट-पत्थर के टुकड़े मारता था
उसके नंगे बदन पर
कोई धूल-कीचड़ उलीचता था
उसके घायल शरीर पर
और गालियों-सी भाषा में सब चिड़ाते थे उसे
कहकर- ताऊ! ताऊ!! ताऊ!!!
चिढ़कर प्रतिकार में/वह भी
उनको लक्ष्य करके/इधर-उधर
ईंट-पत्थर के टुकड़े फेंकता था/धुन्ध-कीचड़ उलीचता था/गालियां-सी बुदबुदाता था
और अन्ततः - ‘हू...ऊ...ऊ....हु...र्.....र्....र....’ की
डरावनी आवाज के साथ
उन्हे काफी दूर तक खदेड़ता था
इतने पर भी नहीं छोड़ते थे बच्चे उसका पीछा
तो बैठकर नाली के किनारे फुटपाथ पर
घुटनों में सिर छुपाकर
खूब रोया करता था वह /अपने भाग्य पर
इस खेल में कई बार/कुछ बड़े भी शामिल होते थे
लोग उसे पागल कहते थे

हाँ, वह एक पागल था
पागल ही नहीं, महापागल था
सिर में अढ़ाई सेर धूल का जमाव
शरीर पर मैल के मोटे-मोटे कतरे/ऊपर से सैकड़ों घाव
ओढ़ना और बिछौना थी/शरीर पर पड़ी
वर्षों पुरानी/मैली-कुचैली/फटी-नुची
मात्र आधा मर्दाना धोती
और हाथों में एक गन्दा सा कुल्हड़
बस यही थी- उसकी कुल सम्पत्ति

लोगों की दृष्टि में
हड्डियों के टूटने और सिर के फूटने से
उसे दर्द नहीं होता था शायद
मगर मैं देखा करता था- अपनी अधमुँदी आँखों से
आह! ईंट-पत्थरों की मार से
उसका वह निरीहतापूर्ण बिलबिलाना/दर्द से बुरी तरह छटपटाना
और/उन कथित सभ्य बच्चों, जवानों और बूढ़ों का
तालियाँ पीट-पीटकर आनन्दित होना
इतने पर भी/जब कभी मौका मिलता था
वह- हँसते-खेलते बच्चों को/टुकुर-टुकुर देखता था
उनकी स्वच्छन्द किलकारियों में डूबकर
कितने भोलेपन से मस्त होता था!
मैं उस निरीह बूढ़े को लेकर/जाने क्या-क्या सोचता था
उसके साथ/जैसे अपना
कोई सांस्कृतिक रिश्ता जोड़ता था!

एक लम्बे अर्से बाद/कस्बे में पुनः लौटा हूँ
मन की तहों में दबी बेचैनी से उद्वेलित होता हूँ
तो खुलकर/उस परम श्रद्धेय की तलाश करता हूँ
मेरी खुली तलाश पर/लोग हँसते हैं
खूब व्यंग्य कसते हैं-
‘वह कहीं नहीं गया/सीधा तेरे अन्दर समा गया है’
मुझे लगता है-
कस्बे का एक-एक बच्चा मेरे पीछे पड़ा है
हाथों में ईंट-पत्थर के टुकड़े लिए/धूल उलीचते हुए
और आनन्दित होकर/समवेत स्वर में चीखते हुए-
ताऊ! ताऊ!! ताऊ!!!
किन्तु मेरी तलाश रुकती नहीं है
मेरे अन्दर की सम्वेदना मरती नहीं है
मुझे बार-बार याद आता है-
‘हँसते-खेलते बच्चों को देखकर
उस कथित पागल का/वह भोलेपन से मस्त होना
बिना शिकवा-शिकायत के/ईंट-पत्थरों की मार सहना’

मैं ढूँढ़ता हूँ उसे
कस्बे की बस्तियों-बाजारों में
गाँवों की गलियो-हाटों में
पहाड़ों की गुफाओं-तलहटियों में
नालों/नदियों/नहरों/समुद्रों की गहराइयों में
जंगलों की झाड़ियों में/मैदानों की दूरियों में
हर कहीं खोजता हूँ
आदमी/पशु-पक्षी/पेड़-पोधों
गर्मी/वर्षा/सर्दी/धूप और हवा
सभी से पूछता हूँ उसके बारे में
कितनी अमानुषिकता फैली है/कि
कोई बात तक नहीं करता उसके बारे में

मैं जानता हूँ
हमारी संस्कृति बहुत बदल गई है
और इस बदली हुई संस्कृति में
उस पागल के लिए कोई स्थान नहीं है
पर/मैं यह भी जानता हूँ, कि-
उस कथित पागल की आँखों में/जो दिखता था
वह हमारी मूल संस्कृति की निशानी है
उसके बिना
हर मानवीय संस्कृति बेमानी है

मैं उसे खोजूँगा/जरूर खोजूँगा
खोजकर उसे
‘महामानव’ के रूप में प्रतिष्ठित करूँगा
मानवता के जिस स्तम्भ पर
खड़ी है संस्कृति हमारी!
मेरा वह ’महामानव’ है/उसका
सबसे बड़ा पुजारी!!

Thursday, June 30, 2011

एक व्यक्ति का होना


सत्ता के साये से निकलकर
कितना महत्वपूर्ण होता है
एक व्यक्ति का होना
सत्ता के चरित्र/और
सत्ता के विरोध
दोनों को दरकिनार करके
कितना महत्वपूर्ण होता है
सत्ता की ही एक कुर्सी पर
एक व्यक्ति का बैठना
यह साबित करता है
इस शहर से
पॉलीथीन का गायब होना

भले, इस भले काम में
शामिल है आज- पूरा का पूरा शहर
पर शहर तो यही था कल भी
नहीं था तो बस एक व्यक्ति!

कुछ लोग कहते हैं-
कितने दिनों तक रहेगी यह बंदिश
हो सकता है- लोग सही हों
और कल फिर फैल जाये वही तपिश
लेकिन क्या तब
और अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो जायेगा
एक व्यक्ति का होना?
जो सत्ता का चरित्र नहीं बनता
सत्ता का विरोध भी नहीं करता
सिर्फ सत्ता का उपयोग करता है
और बिना जताये/पूरी सहजता के साथ
सत्ता के विरोधके उद्देश्य तक पहुँचता है

अन्यथा जोउद्देश्य
नहीं हो पाता है हासिल
व्यक्तियों के होने से
क्यों हासिल हो जाता है
एक व्यक्ति के होने से!

और हाँ,
यदि हासिल हो सकता है
कोई एक उद्देश्य
तोऔरभी हो सकते हैं
बात-
सिर्फ सत्ता के साये से निकलने की है
एक व्यक्ति होनेकी है!

Sunday, September 26, 2010

कुछ हाइकु


||एक||
टालना छोड़ो
होने दो एक बार
होना है जो भी!

||दो||
अलविदा, हे!
शब्दों का यह गुच्छा
तुम्हारे लिए

||तीन||
फिर मिलेंगे
जो नहीं निभ सका
निभाने उसे

||चार||
मैं देखूं बस
मछली की सूरत
इस झील में

Monday, August 30, 2010

कुछ छुटपुट हाइकु

०१.
डूबे मगर
उछले भी तो खूब
मछली बन

०२.
दिल में कहीं
खदकता सा कुछ
आँखों में गिरा

०३.
लू के थपेड़े
खाए तो समझा, यूं
सूरज भी है

०४.
देखूँ कितने
छोटी छोटी आँखों से
बड़े सपने!

०५.
लिखते हुए
टूटी कलम, जैसे
सपने मेरे!

०६.
आसमां पर
लिखी नहीं पड़ता
भाषा कोई!

०७.
लिखे जो शब्द
ठूंठ से खड़े रहे
कोष के द्वारे

०८.
पेड़ पै टंगे
वे पत्ते सूखकर
उसूल बने!

०९.
झांका मन में
सुरंग में केवल
नीरवता थी

१०.
देखो तो कभी
समुद्र में उतर
जी भरकर!

Thursday, July 22, 2010

विध्वंस तुम्हारे वश में नहीं है

तुम 'जो कुछ' लड़ रहे हो
'उसे' लड़ते हुए
कभी नहीं थकोगे
जानता हूँ
तुम्हारे अंधे जूनून को
पहचानता हूँ

थोड़े से व्यय से
अधिक आय का वहम
जब किसी के दिलोदिमांग पर
छा जाता है
तो थकावट का कचरा भी
अंध-उत्साह के दरिया के
भयानक बहाव में बह जाता है
तुम थोड़े से गोली-बारूद के व्यय से
बहुत सारी निर्दोष 'जानों' को
'आय' मानकर
अपनी क्रूरता के बोरों में भर रहे हो
सोचकर देखो
भारी भूल कर रहे हो
व्यय के खाते में / लेखा
गोली-बारूद का नहीं
उन मौतों का होता है
जिनका अपव्यय / तुम
अपनी आत्म-चिंतन की
तिजौरी का ताला तोड़कर कर रहे हो
काश! तुमने थोड़ी-सी
शिक्षा पाई होती
तो जरूर / तुम्हारी समझ में
इतनी सी बात आयी होती
'जान' लेना कोई 'आय' नहीं होता
मौत देना / जरूर
बहुत बड़ा 'अपव्यव' होता है

यह भी जानता हूँ
सोच की मशीनी प्रक्रिया में स्थिति होकर
मशीन की ही तरह
ये कर्म कर रहे हो
जिसका लक्ष्य
सिर्फ सपनों में होता है
तुम
ऎसी व्यापारिक इकाई बन रहे हो
तुम्हें स्वयं नहीं मालूम
'क्या' और 'क्यों' कर रहे हो

सपनों की नाल पकड़े
पल-पल / बिना थके
क्रूरता की गहराई में
तुम उतरते-चढ़ते हो
पर / क्या कभी इन सपनों के
स्रोत तक पहुंचते हो ?

यद्यपि तुम ब्रह्मा नहीं हो
उनके अनुयायी भी नहीं हो
फिर भी तुम्हारे लिए समझना जरूरी है
कमल की नाल पकड़कर
अथाह जल की अनंत गहराइयों में उतरकर
वह भी नहीं खोज पाए थे
कमल-नाल का स्रोत
वह स्रोत तो / सृजन के
छोटे से बीज में समाया था
जिसके लिए कमल-नाल के सहारे
किसी उछल-कूद की नहीं
थोडा सा ध्यानस्थ होने की जरूरत थी
जिसे अंततः उन्होंने अपनाया था

तुम्हारे सपनों का स्रोत भी
कहीं वहां विद्यमान है
जहाँ तुम्हारी सोच की मशीनी प्रकिया
तुम्हें लेकर नहीं जाती है
इसीलिए तुम्हारे कर्मों की
अपेक्षित परिणति भी नहीं हो पाती है
मात्र एक व्यापारिक इकाई की तरह
तुम
चलते भर रहते हो
'वो' जो तुम लड़ रहे हो
लड़ते भर रहते हो

हो सके तो
दो मिनट के लिए विश्राम करो
और मेरी छोटी सी बात
ध्यान से सुनो
ब्रह्मा जी- तुम्हारे भी 'परम' हैं
क्योंकि, वे- देवता और दैत्यों
दोनों के जनक हैं
उनके पद-चिन्हों पर
थोडा तो चलकर देखो
कालचक्र को साक्षी बनाकर
सपनों के वास्तविक स्रोत के बारे में सोचो

ब्रह्मा से पहले
रौद्र का प्रकटीकरण नहीं होता
यह बात अच्छी तरह समझ लो
जो कुछ तुम कर रहे हो
अनथक करते हुए भी
विध्वंस तुम्हारे वश में नहीं है
और वह
तुम्हारा अंतिम लक्ष्य भी नहीं है
इसलिए
और अपेक्षित परिणति के लिए
सृजन की ओर कूंच करो
देवता या दैत्य !
तुम जो कोई भी हो

Thursday, July 15, 2010

तुम्हारी स्थिति

तुम
धरती की
आँख बनकर उगे
फिर भी
धरती अंधी है
बताओ मेरे आका
अब
कहाँ तुम्हारी स्थिति है ?

कहीं ऐसा तो नहीं
कि / तुम उगे होओ
धरती के चेहरे की बजाय
उसके किसी पांव के तलबे में
और जब
घुटुरुओं चलती धरती
पहली-पहली बार
पांवों के बल चली हो
तब / तुम
कुचल गए होओ
पहली बार में ही ?